
राजकुमार सिंह
BJP में पीढ़ीगत परिवर्तन का प्रतीक बताए जा रहे नितिन नवीन को अपनी टीम बनाने में लगभग आठ महीने लग गए। 46 साल के राष्ट्रीय अध्यक्ष की 65 सदस्यीय टीम में 35 साल के हेमांग जोशी सबसे युवा हैं, तो 73 साल की वसुंधरा राजे सबसे उम्रदराज। वैसे टीम की औसत आयु 54 वर्ष है, जो उम्रदराज भारतीय राजनीति के मद्देनजर ज्यादा नहीं।
मुश्किल वक्त। इस टीम की असली परीक्षा आने वाले विधानसभा चुनाव और बीच-बीच में Gen Z और जेन अल्फा के तेवर ही होंगे। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों और फिर TMC-शिवसेना (यूबीटी) में तोड़फोड़ से सातवें आसमान पर पहुंचे आत्मविश्वास वाली BJP के लिए पिछला एक महीना बेहद मुश्किल रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर पार्टी तक, सभी Gen Z को साधने में जुटे हैं, पर उधर से जवाबी चेतावनियां बदस्तूर जारी हैं। जंतर-मंतर के बाद राज्यों में जिस तरह शिक्षा और परीक्षा प्रणाली को लेकर नई पीढ़ी सड़कों पर उतर रही है, उससे सत्ता व्यवस्था ही नहीं, उसका नेतृत्व करने वाली राजनीतिक व्यवस्था की चुनौतियां भी बढ़ेंगी।
पुरानी अनदेखी। बेशक शिक्षा से ले कर परीक्षा तक, सब कुछ अचानक गड़बड़ नहीं हुआ। यह भ्रष्ट तंत्र के दशकों पुराने शुतुरमुर्गी रवैये का परिणाम है। इसका मलबा तो सभी राज्य सरकारों पर गिरेगा, लेकिन सबसे ज्यादा मुश्किलें BJP की बढ़ेंगी क्योंकि वही सबसे अधिक राज्यों में है। साथ ही, जंतर-मंतर प्रकरण के बाद Gen Z के निशाने पर भी
अधूरा संवाद। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस पीढ़ी से उसी की शैली में संवाद करने का प्रयास किया। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी पहल की, लेकिन इन कोशिशों में एकरूपता और समन्वय का अभाव दिखता है। नितिन नवीन ने Gen Z को वायरस कह दिया, तो संघ के दूसरी-तीसरी पंक्ति के नेता भी उनके देश प्रेम पर सवालिया निशान लगाते रहे। प्रधानमंत्री की ‘दिगामी नक्सल’ संबंधी टिप्पणी को भी विपक्ष उसी नजरिये से पेश करेगा।
प्रभावी मुद्दा। ऐसे में आने वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकने वाली युवा पीढ़ी को साध पाना टीम नितिन के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। मोदी सरकार में जितने भी आंदोलन हुए, उन्हें जाति-वर्ग-संप्रदाय की विभाजक रेखाओं में बांट दिया गया। लेकिन, जंतर-मंतर पर एकजुट छात्रों-युवाओं को नहीं बांटा जा सका। उनमें वामपंथ और आम आदमी पार्टी से जुड़े चेहरे साफ दिख रहे थे, पर मुद्दा इतना प्रभावी था कि आंदोलन पर राजनीतिक ठप्पा नहीं लगाया जा सका।
मुश्किल मॉनसून सत्र। मोदी सरकार और BJP की मुश्किलें संसद के हंगामेदार मॉनसून सत्र से भी बढ़ गई हैं। बेशक अतीत में भी विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में ऐसे अवसर आए, लेकिन उन उदाहरणों से वर्तमान की गलतियों को सही नहीं ठहराया जा सकता। माना कि सत्तापक्ष और विपक्ष के सहयोग से ही संसद सुचारू रूप से चल सकती है, लेकिन मनमोहन सिंह के दौर में BJP ने बार-बार याद दिलाया कि सदन चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की है।
बैकफुट पर। हालांकि जिस राजनीतिक दल और नेतृत्व ने लगातार तीसरी बार केंद्र में सरकार बनाने का करिश्मा कर दिखाया, उसे कम आंकने की भूल नहीं करनी चाहिए, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में खुद BJP का बहुमत के आंकड़े से पीछे छूट जाना बताता है कि चमक फीकी तो पड़ी है। उसके बाद हुए ज्यादातर विधानसभा चुनावों में जीत और विपक्षी दलों में तोड़फोड़ से BJP उस झटके से उबरती दिख रही थी।
मॉनसून सत्र से पहले तो सारा राजनीतिक विमर्श इस पर केंद्रित हो गया था कि क्या बजट सत्र में गिर गए परिसीमन विधेयक को इस बार पारित करवाने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत का जुगाड़ पार्टी ने कर लिया है। विपक्ष आशंकित भी था, लेकिन जंतर-मंतर ने फिर से सरकार और संगठन को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया।
यूपी का इम्तिहान। इतिहास बताता है कि BJP झटकों से उबरने में माहिर है, लेकिन चुनावी परीक्षा का कोई विकल्प नहीं होता। पार्टी का सबसे बड़ा इम्तिहान यूपी में होगा। उत्तर प्रदेश में ही पिछले लोकसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस के साथ मिल कर BJP को जोरदार झटका दिया था। पार्टी ने अब आजमाये हुए विनोद तावड़े को प्रभारी बनाया है। कांग्रेसी अंतर्कलह और AAP के विरुद्ध सत्ता विरोधी भावना के बीच पंजाब में भी चमत्कार की आस लगा रही BJP ने पड़ोसी राजस्थान के जाट नेता सतीश पूनिया को प्रभारी बनाया है। दोनों ही दांव अच्छे हैं, पर अतीत के अनुभव बताते हैं कि जमीनी समीकरण साधे बिना चमत्कार नहीं होते।



