
भोपाल
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में डाक विभाग को बड़ा झटका देते हुए बीना पोस्ट ऑफिस शाखा में हुई 36.4 लाख रुपये की धोखाधड़ी के पीड़ितों को राहत प्रदान की है। अदालत ने साफ किया है कि सुरक्षित सरकारी परिसर के भीतर अधिकृत दिखने वाले कर्मचारियों पर भरोसा करने वाले आम नागरिकों को इसकी सजा नहीं मिल सकती। हाईकोर्ट ने डाक विभाग को निर्देश दिया है कि वह सभी पीड़ित जमाकर्ताओं को उनका डूबा हुआ पैसा कानूनी ब्याज के साथ वापस करे।
कुल 36.4 लाख रुपये की हेराफेरी
यह पूरा मामला मध्य प्रदेश के बीना स्थित पोस्ट ऑफिस शाखा का है, जहां कुछ कर्मचारियों ने मिलकर कई जमाकर्ताओं को फर्जी नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट और टर्म डिपॉजिट एडवाइस स्लिप थमा दी थीं। इस तरह कुल 36.4 लाख रुपये की हेराफेरी की गई थी। मामले का खुलासा होने के बाद मध्य प्रदेश पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी पोस्ट ऑफिस कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया था, जिन्हें बाद में ट्रायल के बाद कोर्ट ने दोषी ठहराया।
डाक विभाग ने पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी
जब ठगी के शिकार लोगों ने अपने पैसे वापस पाने के लिए डाक विभाग के पास क्लेम किया, तो विभाग ने शुरुआती दौर में मुआवजे की मांग को ठुकरा दिया था। विभाग की दलील थी कि निवेशकों ने काउंटर पर मौजूद अधिकृत कर्मचारियों के जरिए पैसे जमा नहीं किए थे, और जिन कर्मचारियों ने धोखाधड़ी की थी, वे उस विशेष शाखा में उस समय आधिकारिक रूप से तैनात नहीं थे। विभाग का तर्क था कि ग्राहकों को लेन-देन से पहले कर्मचारियों की पोस्टिंग और प्रामाणिकता की जांच करनी चाहिए थी।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और फैसला
मामले की सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जस्टिस मनेंद्र एस. भट्टी) ने डाक विभाग के तर्कों को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एक सामान्य नागरिक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सरकारी कार्यालय के भीतर बैठे किसी कर्मचारी की आंतरिक ट्रांसफर लिस्ट या पोस्टिंग ऑर्डर की ऑडिटिंग या जांच करे। पीड़ित पूरी तरह से सद्भावना के साथ पोस्ट ऑफिस परिसर के भीतर गए थे।
कोर्ट ने डाक विभाग के अपने ही 27 मई 2021 के एक सर्कुलर का भी हवाला दिया, जिसमें फर्जी पासबुक और ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक स्पष्ट व्यवस्था दी गई है, जहां ग्राहकों को अंधाधुंध तरीके से बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता।
पीड़ितों के लिए क्या हैं निर्देश?
हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी प्रभावित जमाकर्ता निर्धारित क्लेम फॉर्म भरकर 30 कार्य दिवस के भीतर जमा करें।
संबंधित सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिए गए हैं कि वे फॉर्म मिलने के बाद 90 दिनों के भीतर दावों का निस्तारण करें।
पीड़ितों को मूल राशि के साथ-साथ नियमानुसार लागू ब्याज भी प्रदान किया जाएगा। इस फैसले को वित्तीय संस्थानों में संस्थागत जवाबदेही के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है।



